भारत सरकार द्वारा नाइस (नाइमेसुलाइड) टैबलेट पर प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद देश के कई हिस्सों में मेडिकल स्टोरों पर यह दवा खुलेआम बिकती नजर आ रही है। सवाल यह है कि जब सरकार ने स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए इस दवा पर रोक लगा दी है, तो फिर आम लोगों तक यह कैसे पहुंच रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार नाइमेसुलाइड दवा के सेवन से लीवर पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है। इसी को देखते हुए केंद्र सरकार ने 100 एमजी या उससे अधिक खुराक वाली नाइमेसुलाइड टैबलेट के निर्माण, बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगाया है। इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि कई मेडिकल दुकानों पर यह दवा बिना डॉक्टर की पर्ची के भी आसानी से उपलब्ध है।
इस स्थिति के पीछे कई कारण सामने आ रहे हैं। एक कारण यह है कि बैन से पहले का पुराना स्टॉक अभी भी कई मेडिकल स्टोरों के पास मौजूद है, जिसे खपाने के लिए दुकानदार दवा बेच रहे हैं। दूसरा बड़ा कारण औषधि विभाग और स्थानीय प्रशासन की कमजोर निगरानी मानी जा रही है। कई जगहों पर अब तक सख्त जांच अभियान नहीं चलाए गए हैं, जिससे दुकानदारों के हौसले बुलंद हैं। इसके अलावा कुछ मेडिकल स्टोर संचालकों का तर्क है कि प्रतिबंध केवल अधिक खुराक वाली दवा पर है, इसलिए वे कम खुराक के नाम पर नाइस टैबलेट बेच रहे हैं, जबकि आम उपभोक्ता को इस तकनीकी अंतर की जानकारी नहीं होती। नतीजतन मरीज अनजाने में ऐसी दवा का सेवन कर रहे हैं, जो उनके स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकती है। बिना पर्ची प्रतिबंधित या विवादित दवाओं की बिक्री पहले से ही एक गंभीर समस्या रही है। नाइस टैबलेट का मामला भी उसी कड़ी का हिस्सा बनता जा रहा है, जहां नियम-कानून कागजों तक सीमित नजर आ रहे हैं। यदि समय रहते प्रशासन ने सख्ती नहीं दिखाई, तो यह लापरवाही किसी बड़ी स्वास्थ्य समस्या को जन्म दे सकती है। अब जरूरत है कि स्वास्थ्य विभाग और औषधि नियंत्रण विभाग संयुक्त रूप से सघन जांच अभियान चलाएं, प्रतिबंधित दवाओं का स्टॉक जब्त करें और नियम तोड़ने वाले मेडिकल स्टोरों पर कड़ी कार्रवाई करें। साथ ही आम जनता को भी जागरूक किया जाए, ताकि वे बिना डॉक्टर की सलाह के ऐसी दवाओं का सेवन न करें और अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ से बच सकें।

