बाबागंज (बहराइच)। नशे का जहर अब घर-घर में पैठ बनाने लगा है। बाबागंज, बरवलिया, रुपईडीहा सहित आसपास के गांवों और कस्बों में स्मैक की लत ने कई परिवारों की नींव हिला दी है। यह खतरनाक नशा युवाओं को इस कदर जकड़ चुका है कि कई घर बर्बादी की कगार पर पहुंच गए हैं। हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि स्मैक न मिलने पर लती व्यक्ति तड़पने लगता है और बेसुध हालत में यही मांग करता है— “मेरे मुंह में धुआं छोड़ दो…”। अब यह दृश्य असामान्य नहीं, बल्कि आम हो चला है।
नशे की गिरफ्त में उजड़ते घर
कभी पढ़ाई-लिखाई और खेलकूद में अव्वल रहने वाले युवा आज स्मैक की गिरफ्त में दिन-रात भटकते देखे जा सकते हैं। नशे की खपत इतनी बढ़ गई है कि एक पुड़िया स्मैक के लिए 200 से 500 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। जब पैसे नहीं होते, तो ये युवक चोरी-चकारी का रास्ता अख्तियार कर लेते हैं—घर का कीमती सामान बेच देना, कबाड़ की दुकानों पर गहने या बर्तन गिरवी रख देना आम बात हो गई है। कई बार तो संपन्न परिवारों के बेटे भी भीख मांगते नजर आते हैं। परिणामस्वरूप उनके माता-पिता और परिवारजन भूखे-प्यासे, आंसू बहाते जीवन काटने को मजबूर हैं।
तस्करी और सप्लाई चैन पर सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्मैक आखिर आ कहां से रही है? कौन लोग इस जानलेवा कारोबार को बढ़ावा दे रहे हैं? इसकी सप्लाई चैन पर रोक लगाने में पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी अहम है। अगर समय रहते इस नेटवर्क को ध्वस्त नहीं किया गया, तो हालात और विकराल हो सकते हैं।
सिर्फ प्रशासन नहीं, समाज को भी निभानी होगी भूमिका
नशे के खिलाफ सिर्फ पुलिसिया कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। समाज के जागरूक नागरिकों, बुद्धिजीवियों, जनप्रतिनिधियों और अभिभावकों को भी आगे आना होगा। बच्चों की संगत, उनकी आदतों और मानसिक स्थिति पर लगातार नजर रखनी होगी। जागरूकता अभियान, काउंसलिंग और पुनर्वास जैसे कदम भी जरूरी हैं, ताकि लत के शिकार युवाओं को सामान्य जीवन की राह पर लौटाया जा सके।
अभी चेते, तभी बचेगी पीढ़ी
जरूरत है कि प्रशासन सख्ती दिखाए, नशे के अड्डों की पहचान कर उन्हें पूरी तरह खत्म करे। वहीं समाज भी चुप बैठने के बजाय खुलकर सामने आए। अगर अब भी हम लापरवाह बने रहे, तो आने वाले कल में पूरी एक पीढ़ी नशे में खो जाएगी, जिसकी भरपाई संभव नहीं होगी।
स्मैक की लत से तबाह होते परिवार : प्रशासन और समाज की साझा जिम्मेदारी जरूरी
बाबागंज (बहराइच)। नशे का जहर अब घर-घर में पैठ बनाने लगा है। बाबागंज, बरवलिया, रुपईडीहा सहित आसपास के गांवों और कस्बों में स्मैक की लत ने कई परिवारों की नींव हिला दी है। यह खतरनाक नशा युवाओं को इस कदर जकड़ चुका है कि कई घर बर्बादी की कगार पर पहुंच गए हैं। हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि स्मैक न मिलने पर लती व्यक्ति तड़पने लगता है और बेसुध हालत में यही मांग करता है— “मेरे मुंह में धुआं छोड़ दो…”। अब यह दृश्य असामान्य नहीं, बल्कि आम हो चला है।
नशे की गिरफ्त में उजड़ते घर
कभी पढ़ाई-लिखाई और खेलकूद में अव्वल रहने वाले युवा आज स्मैक की गिरफ्त में दिन-रात भटकते देखे जा सकते हैं। नशे की खपत इतनी बढ़ गई है कि एक पुड़िया स्मैक के लिए 200 से 500 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। जब पैसे नहीं होते, तो ये युवक चोरी-चकारी का रास्ता अख्तियार कर लेते हैं—घर का कीमती सामान बेच देना, कबाड़ की दुकानों पर गहने या बर्तन गिरवी रख देना आम बात हो गई है। कई बार तो संपन्न परिवारों के बेटे भी भीख मांगते नजर आते हैं। परिणामस्वरूप उनके माता-पिता और परिवारजन भूखे-प्यासे, आंसू बहाते जीवन काटने को मजबूर हैं।
तस्करी और सप्लाई चैन पर सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्मैक आखिर आ कहां से रही है? कौन लोग इस जानलेवा कारोबार को बढ़ावा दे रहे हैं? इसकी सप्लाई चैन पर रोक लगाने में पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी अहम है। अगर समय रहते इस नेटवर्क को ध्वस्त नहीं किया गया, तो हालात और विकराल हो सकते हैं।
सिर्फ प्रशासन नहीं, समाज को भी निभानी होगी भूमिका
नशे के खिलाफ सिर्फ पुलिसिया कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। समाज के जागरूक नागरिकों, बुद्धिजीवियों, जनप्रतिनिधियों और अभिभावकों को भी आगे आना होगा। बच्चों की संगत, उनकी आदतों और मानसिक स्थिति पर लगातार नजर रखनी होगी। जागरूकता अभियान, काउंसलिंग और पुनर्वास जैसे कदम भी जरूरी हैं, ताकि लत के शिकार युवाओं को सामान्य जीवन की राह पर लौटाया जा सके।
अभी चेते, तभी बचेगी पीढ़ी
जरूरत है कि प्रशासन सख्ती दिखाए, नशे के अड्डों की पहचान कर उन्हें पूरी तरह खत्म करे। वहीं समाज भी चुप बैठने के बजाय खुलकर सामने आए। अगर अब भी हम लापरवाह बने रहे, तो आने वाले कल में पूरी एक पीढ़ी नशे में खो जाएगी, जिसकी भरपाई संभव नहीं होगी।


