👉अवध की विरासत और अपनी पहचान की तलाश
👉नवाबगज में बने घण्टा घर का सौंदर्यकरण करना आवश्यक
(अरुण राव)
नवाबगंज-बहराइच। भारत-नेपाल सीमा के निकट स्थित नवाबगंज क्षेत्र अपनी भौगोलिक स्थिति, स्थानीय संस्कृति और सामाजिक पहचान के लिए जाना जाता है। लेकिन इस क्षेत्र का पुराना इतिहास आज भी विस्तृत शोध और दस्तावेजी जानकारी की प्रतीक्षा कर रहा है।
‘नवाबगंज’ नाम नवाबी दौर की याद दिलाता है। हालांकि, बहराइच के नवाबगंज की स्थापना कब हुई, इसका नाम किसके नाम पर पड़ा और यहां किन शासकों या जमींदारों का प्रभाव रहा—इन सवालों के प्रमाणिक जवाब तलाशना जरूरी है। बहराइच जनपद का इतिहास प्राचीन श्रावस्ती, चर्दा के ऐतिहासिक क्षेत्र और अवध की रियासतों से जुड़ा रहा है। ब्रिटिशकालीन गजेटियर में भी बहराइच के पुराने इतिहास, स्थानीय रियासतों और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित विवरण मिलते हैं।
👉इतिहास को सहेजने की जरूरत
नवाबगंज की ऐतिहासिक पहचान को सामने लाने के लिए पुराने राजस्व अभिलेखों, गजेटियर, जमींदारी दस्तावेजों और बुजुर्गों की मौखिक परंपराओं का अध्ययन आवश्यक है। इससे क्षेत्र के पुराने गांवों, ऐतिहासिक स्थलों और सामाजिक विकास की जानकारी नई पीढ़ी तक पहुंच सकती है। सवाल यह है कि नवाबगंज के इतिहास को दस्तावेजों में दर्ज कर उसकी विरासत को संरक्षित करने के लिए स्थानीय स्तर पर पहल कब होगी?नवाबगज में बने घंटाघर को सहेजने की जरूरत है और उसकी सौंदर्यकरण करना अति आवश्यक हैं।

